
भविष्य संवारने की जद्दोजहद या फिर बीते कल की परछांई से बोझल जिंदगी जीने वाले युवाओं को..तीन किरदारों के ज़रिए खुल कर जीने का अंदाज़ सिखाती ये फिल्म युवाओं को बेहद भाएगी क्योंकिं अंदाज़-ए-बयां काफी रोमांचक और नयापन लिए है..फिल्म देखते वक्त बस एक बात खटकती है आम इंसान के,एक मिडिल क्लास व्यक्ति के डर केवल आसमान से कूदने,समुद्र की गहराई नापने या बुल-फाइट से अलग होते हैं...उसके मन की गहराईयों में छिपे छोटे-छोटे से डर मसलन,ऐसा करूंगा तो किसी को बुरा तो ना लग जाएगा,कहीं असफल हुआ तो क्या होगा,ऐसा किया तो ज़माना क्या सोचेगा...वगैरह-वगैरह ये तुच्छ से लगने वाले भय भी जीने का अंदाज़ बिसरा देने के लिए काफी होते हैं...ऐसे भय को पर्दे पर उतारने के लिए..जिन तीन इच्छाओं या डर का फिल्मांकन किया गया है वहां डायरेक्टर की कमर्शियल सिनेमा को हिट या प्लॉप करने की मजबूरी साफ नज़र आती है....और शायद इसीलिए ये फिल्म ज्यादातक युवाओं तक पहुंचती दिखती है और वरिष्ठों से दूरियां बनाती लगता है...जबकि ये सच तो हर उम्र..हर वर्ग और हर किसी के लिए है कि..ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा...कल किसने देखा..सो आज है उसे जी लो...खुल के जिओ...हर पल को जीओ..दिल की सुनो...
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