जाने कितनी बार..जाने किस-किस से और ना जाने कितने ही तरीकों से...कहा होगा हमने..कि हम बदल रहे हैं...समाज बदल रहा है...सोच बदल रही है...बर्ताव बदल रहा है...पर ना जाने क्यूं मुझे लगता है कि...अक्सर ऐसा बोलते वक्त हम शायद ये लिखना..बताना..या जताना भूल जाते हैं कि जिस बदलाव या परिवर्तन की बात आप और हम कर रहे हैं वो केवल और केवल ज़मीन पर फैलते कॉन्क्रीट के जंगल या तन पर बदलते कपड़ों के बारे में है...दरअसल,मन से तो हम वैसे ही हैं...बल्कि सच तो ये है कि हम बदलना ही नहीं चाहते...नहीं बदलता चाहते हमारी सदियों पुरानी सोच को...नहीं बढ़ाना चाहते अपनी कल्पनाशीलता का दायरा...नहीं चाहते कि कोई भी तब्दीली हो..हमारी अपनी छोटी सी सोची-समझी-सिमटी दुनिया में...बल्कि हम तो परिवर्तन को भी अपनी छोटी सी सोच के मुताबिक ही परिभाषित करते हैं...गर ऐसा ना होता आप...मैं...हम सब पड़ोसी के घऱ में क्रांन्तीकारी के पैदा होने का इंतज़ार ना करते...गर ऐसा ना होता तो आज भी रवायतों की आड़ में चाहे-अनचाहे...कुरीतियों को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे ना बढ़ाते...गर ऐसा ना होता तो आज भी...दिखावे के लिए जीवन भर की पूंजी ना लगाते...पहली बार में आप तपाक से कह सकते हैं कि मैं तो ऐसा नहीं हूं...क्योंकि ये झूठ बोलने की आदत तो हमे बचपन से ही है...क्या कहा नहीं है....एकत बार फिर सोचिए...बस एक बार तो सोचिए...
सोमवार, 18 जुलाई 2011
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